Sunday, February 20, 2011



यद्द्छालाभाम्संतुश्तो द्वन्द्वातीतो विमत्सर : सम: सिद्दावसिद्धो च कृत्वापि न निबध्यते :


Saturday, February 19, 2011

ग़ज़ल : हमारा नाम भी आया होगा !!

रास्ता मेरे घर का लुटेरों को उन्होंने ही बताया होगा

जिन्हें हमने कभी घर प्रेम से खाने पे बुलाया होगा!

रास्ता सर्द था और रहबर ने पासा फेंका ही आखिर

फिर भी पार हमें किसी रहजन ने कराया ही होगा !

इसमें ज्यादा तफ्तीश की जरूरत ही नहीं है अजय

भगवन का स्वर्ण !मुकुट पुजारी ने चुराया ही होगा!

यूँ तो भुला न दिया होगा उसके पहले प्यार ने मुझे

कभी तो दबी जुबान पर हमारा नाम आया ही होगा !

Sunday, November 7, 2010

लिखो ऐसा जो सबके काम का हो !:ग़ज़ल

गजल

लिखो ऐसा जो हो सबके काम का औ कल आज कल का हो ,
यकीन मानिये, ये मेरी और आपकी नियति को तय करेगा!

एक बहुत ही छोटे/चर्चित वर्ग को तो कल या आज जाना ही है,
बड़े वर्ग का अपेक्षित हिस्सा ही हर हाल ही इस प्रलय में बचेगा!

हमने सुना पिछली बार सिर्फ मनु-इडा -श्रद्धा ही बचे थे प्रलय में,
तो सोचना है कि हमारे बड़े वर्ग में से अब कौन -कौन ही बचेगा !

यानि कि हर तरह कि शक्सियत मिट जाएँगी आज के दौर से तो ,
इंसानियत के नुमैंदों को कौन आगे इस कायनात पे सजदा करेगा !

दुनियावी बातें आजकल एक अज़ब शक्ल में सामने आ रही हैं अजय ,
सो लिखो/पड़ो ऐसा जो दोज़ख के बाद इन्सान का रास्ता तय करेगा!

Monday, October 18, 2010

हम सच -मुच हैं !!

हम मैं से ज्यादातर

एक-दो या हद से हद तीन कमरों के फ्लैट

में रहते हैं -

हम मकान में नहीं , मकान के भ्रम

में रहते हैं !


किसी ग़लतफ़हमी का शिकार न हों

तो हम में से अधिकतम

शाम घर वापसी पर रीते हो जाते हैं

उम्र से पहले ही बीते

हो जाते हैं !

हम जबरन समझौता कर

पति / पत्नी ,एक-दो अदद बच्चों

के साथ रहते हैं ,

किन्तु वस्तुतः हम अकेले होते हैं !


रविवार की छुट्टी में -

घर का काम निबटते हैं

बचे समय में पैसों को दो का चार

करने की जुगत में लग जाते हैं !

सच में हम कभी जीते ही नहीं हैं /

जीते है लगते हैं ,

हमारे आराम बैंक - किश्तों पे पलते हैं !


मित्रों तो क्या करें -

वक्त के इस मिजाज़ न घबराएँ

इस वक्त को मानस में न स्थाई रूप से सजाएँ

और चुपके से अपने बन जाएँ !

सुबह जब भी मिले मौका

तो बेमतलब निकल जाएँ

वृक्ष देखें /सुनें कलरव /सन्नाटे के गीत

हरी घास पे घूमें / अपने को थोड़ा -

बहुत ही पायें !

दोस्तों इतना भर काफी है

यह आपकी भीतरी आपाधापी को

कुछ तो कम करेगा ही,

भीतर के घावों को कुछ तो भरेगा ही !


में मानता हूँ कि इस मुश्किल दौर में

हम पत्थर बन चुके हैं

लेकिन अगर हम खुद को थोड़ा बहुत उकेर लें

तो हर पत्थर एक जीती जागती मूर्ति है =

जो हम सच-मुच में हैं !






Friday, October 8, 2010

न चिड़ियाँ बचीं न खेत

न चिड़ियाँ बचीं न खेत
एक कहावत थी -
चिड़ियाँ चुंग गयीं खेत
अब न चिड़ियाँ बचीं न खेत
क्या चुगें !
पहले जंगल थे घने
आदमी थे बिखरे-बिखरे बसे
अब आदमी हो गए घने
और जंगल बिखरे-बिखरे !
हमारे भीतर के हालात भी हो चले हैं
चिड़ियों/जंगल की तरह
आदमी के भीतर आ गयी है
उमस भरी गर्मी
भीतरी कोलाहल इतना कि-
शोर मापने की मशीनें जबाब दे चुकी हैं
अब हमारे भीतर भी कुछ नहीं उगता
जो भी थोडा बहुत उपजता है
फलता नहीं है !

Monday, September 27, 2010

मुफलिसी (फक्कडपन ) क्या है !

मुफलिसी (फक्कड़पन ) क्या है !
किसी ने ठीक कहा कि-
दोपहर की रौशनी में भी
कुछ लोग एसी और लाइट जला कर
सोते हैं !
उन्हें मेरा कहना है कि -
चौखट , दीवारों और छतों के भी बिना भी
कुछ लोग रहते हैं !
मुफलिसी हल्के अर्थ में लिया जाता है
यह वस्तुतः शरीर को अलग कर
उसको आत्मा से जोड़ना है
यह जाने हुए भी
खुद को परम सत्ता से जोड़ना है !
हमारी जन्म म्रत्यु का प्रत्यारोपण
मोक्ष में निहित संयोग है
और मुफलिसी
जीवन का असली योग है

Friday, September 17, 2010

ग़ज़ल : उलट-बांसी

ये अजीब शहर है हमेशा धोखा ही देगा तुम्हें

अजनबी सुनी बातों का हिसाब न रखना


नाईट मैच की रौशनी की तरह यहाँ

दिन में रात के लिबास में ही रहना