Tuesday, June 29, 2010

ग़ज़ल -मजबूर चीखों का

जब निकाला गया इतिहास मजबूर चीखों का ,

मानवीय संवेदना की भारी कमी पायी गयी !

मछलियाँ भी उस हर हाथ को अब पहचानती हैं,

जिस हाथ मैं परवरिश की कुछ भी कमी पाई गई !

लोग कहते हैं महलों मैं कुछ भी नहीं होता है ,

खंडहरों मैं फिर क्यों मजदूरों की हंसी पाई गयी !

अजय बड़ी ही मुश्किल है अब इस दुनियां में जीना ,

दूध -मुंहे बच्चों में मां के दूध की कमी पायी गयी !

3 comments:

वन्दना said...

अजय बड़ी ही मुश्किल है अब इस दुनियां में जीना ,

दूध -मुंहे बच्चों में मां के दूध की कमी पायी गयी !
आज का कडवा सच कह दिया……………संवेदनशील रचना।

Udan Tashtari said...

बढ़िया रचना...

ktheLeo said...

वाह!